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Showing posts from April, 2020

व्यक्ति के नीजि अधिकार क्या होना चाहिए

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इतिहास गवाह है जब-जब अर्थशास्त्र और नैतिकता के बीच संघर्ष हुआ है तब  जीत अर्थशास्त्र की हुई है क्योंकि नीहित स्वार्थो को स्वेच्छा से तब तक नहीं टाला जा सकता जब तक गरीब लोगों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ नहीं बनाया जायें।      उदासिनता खतरनाक बीमारी हैं जो लौगो  को पिछडेंपन और गरीबी की ओर ले जाती हैं।      भारत जैसी अर्थव्यवस्था में गरीबी और अमीरी के अंतर को मिटाने के लिए आवश्यक है कि एक ऐसे परिवार के व्यक्ति जो अच्छे पद या प्रतिष्ठित स्थिति में है तो उनसे उनकी अन्य पद या उनकी संपत्ति का अधिकार छीन लेना चाहिए क्योंकि अमीरी और गरीबी का फैसला इसी कारण से हो रहा है                         जिस प्रकार यदि सरकारी नौकरी में एक पद से व्यक्ति यदि दूसरी पद में जाता है तो वह उसके पहले वाले पद को छोड़ देता है या छोड़ना पड़ता है इसी प्रकार इससे समझ सकते हैं कि जमीन को एक निजी संपत्ति ना मानते हुए 1 पद माना जाए और इसी एक निश्चित आधार बनाकर उसे संपत्ति का अधिकार आदि प्रदान किया जाना चाहिए इसके लिए कुछ...

भारतमें पूंजीकरण एक अभिशाप हैं।

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 अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद की ओर बढ़ने वाली प्रकृति निंदनीय हैं इतिहास जानता है कि पूंजीवादी व्यवस्था में कार्य संचालन में केवल प्राइवेट कंपनी एवं ऐसी संस्थाओं द्वारा होता है जिसमें जिसमें मालिक होता है और मालिक का पद पीढ़ी दर पीढ़ी वाला होता है अर्थात मालिक का लड़का या उसका रिश्तेदार ही केवल उस कंपनी का मालिक बन सकता है,चाहे वह योग्यता हो या अयोग्य हो।   यह वैशी व्यवस्था हैं  जैसे प्राचीन काल में राजा का लड़का ही राजा बन सकता था इस तरह पूंजीवादी लोग स्वयं अपने पुत्र या परिवार को ही उत्तराधिकारी बनाते हैं भले ही वह योग हो या अयोग्य। इसलिए भारत इतिहास से इस व्यवस्था का विरोधी रहा है  क्योंकि यह अनैसर्गिक हैं जिसमें गरीब,  गरीब ही रह जाएगा और अपने जीवन में कभी सुधार नहीं कर सकता ऐसी व्यवस्था जो एक गरीब को गरीब  बनाए रखना चाहती है उसकी योग्यता को नष्ट करती हैं यह एक  मानवता का विनाश है, इसके सहारे मानव जाति का विनाश होना निश्चित हैं, भारत को अपने गौरव को बचाना हैं, तो इसका विरोध करना होगा।

प्रकृति ने इंसान को क्यों बनाया

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 प्रकृति ने दुनिया में एक चीज बनाई थी वह है इंसान जो कि दूसरों के दुखों को समझ सकता है और उन समस्याओं का समाधान भी कर सकता है । लेकिन इंसान अपने ही इस विशेष गुण भूल चुका है यदि इस दुनिया में इंसान ही अपने इस काम को भूल जाएगा और अन्य प्राणी की तरह व्यवहार करेगा तो यह दुनिया कैसे चलेगी।  आज आवश्यकता है कि इस धन के पीछे भागने वाली इस व्यवस्था को बदलने की, क्योंकि धन पर ब्याज के नाम पर या अन्य किसी भी नाम पर मालिकाना हक के नाम पर लोग अमीर बनकर के दूसरो को गरीब बनाकर उन्हे प्रताड़ित करते हैं । धन के नाम पर यह बहुत बड़ा वर्ग संघर्ष हो चुका है और यह बहुत ही विनाशक है अनैसर्गिक है । इसलिए दुनिया के सभी लौगो को मिलकर नई सोच विकसित करें नए अवसर खोजे जिससे कि वह स्वयं और इस दुनिया के अन्य प्राणी को भी बचा सकें। धन्यवाद