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Showing posts from 2020

भारत में अंधविश्वास, भ्रष्टाचार कैसे समाप्त हो...

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आज  बेईमानी  और स्वार्थ इस कदर आगे बढ़ चुका है की लोग भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए उसे रोकने वाली शक्ति शिक्षा, शिक्षा को ही समाप्त करना चाहते हैं क्योंकि शिक्षा ही वह माध्यम है जिससे लोग इसे दूर कर सकते है।  आज अराजकता और अनैतिकता से भरे लोगों के द्वारा देश को बर्बाद करने की पहल चल चुकी है इसीलिए आज स्कूलों में शिक्षकों की व्यवस्था नहीं की जा रही है । क्योंकि धर्म के ठेकेदारों को अब समाज में विभिन्न वर्गों के लोग जो अपने बच्चों को एक स्थान पर पहुंचाते हैं एक जैसा व्यवहार करते हैं यह प्रतिक्रिया उन्हें देखी नहीं जा रही है इसलिए अब वह एक नया अध्याय रचने जा रहे हैं अमीरी और गरीबी का क्योंकि यही समाज के सबसे बड़े विनाशक है              क्योंकि इन लोगों की मानसिकता आजादी के पहले वाली हैं जिसमें धर्म के नाम पर लोगों को अंधविश्वासी बनाकर गुलाम बनाए रखा जाता था और एक वर्ग केवल सेवा लेने के लिए होता था वही दूसरा संपूर्ण समाज उनकी गुलामी करता था आज फिर से वैसी ही मानसिकता के आधार को लाने का प्रयास हो रहा है आज शिक्षा व्यवस्था अपने अंतिम दौर प...

भारत एक महान देश कैसे बन सकता हैं। -लिकन

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अब्राहम लिंकन के पिता जूते बनाते थे, जब वह राष्ट्रपति चुने गये तो अमेरिका के अभिजात्य वर्ग को बड़ी ठेस पहुँची!सीनेट के समक्ष जब वह अपना पहला भाषण देने खड़े हुए तो एक सीनेटर ने ऊँची आवाज़ में कहा,   मिस्टर लिंकन याद रखो कि तुम्हारे पिता मेरे और मेरे परिवार के जूते बनाया करते थे!इसी के साथ सीनेट भद्दे अट्टहास से गूँज उठी! लेकिन लिंकन किसी और ही मिट्टी के बने हुए थे! उन्होंने कहा कि, मुझे मालूम है कि मेरे पिता जूते बनाते थे! सिर्फ आप के ही नहीं यहाँ बैठे कई माननीयों के जूते उन्होंने बनाये होंगे! वह पूरे मनोयोग से जूते बनाते थे, उनके बनाये जूतों में उनकी आत्मा बसती है! अपने काम के प्रति पूर्ण समर्पण के कारण उनके बनाये जूतों में कभी कोई शिकायत नहीं आयी! क्या आपको उनके काम से कोई शिकायत है? उनका पुत्र होने के नाते मैं स्वयं भी जूते बना लेता हूँ और यदि आपको कोई शिकायत है तो मैं उनके बनाये जूतों की मरम्मत कर देता हूँ! मुझे अपने पिता और उनके काम पर गर्व है! सीनेट में उनके ये तर्कवादी भाषण से सन्नाटा छा गया और इस भाषण को अमेरिकी सीनेट के इतिहास में बहुत बेहतरीन भाषण माना गया है और उसी भाषण स...

बेरोजगारी कैसे दूर हो सकती हैं

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बेरोजगारी दूर करने का एक ही उपाय हैं सरकार शिक्षितो और अनपढ़ों में बहुत भेदभाव करना कम कर दे क्योंकि आज व्यक्ति को अनपढ़ को जानवर और शिक्षित को भगवान समझा जाने लगा है जरूरत है कि इन दोनों ही क्षेत्रों में लोगों को जो वेतन दिया जाता है उसमें समानता लाने कि जब तक यह समानता नहीं आएगी तब तक बेरोजगारी समाप्त नहीं हो सकती क्योंकि व्यक्ति बेरोजगार रहना पसंद कर सकता है भूखा रह सकता है लेकिन अपने कर्म को बड़ा नहीं मान कर अपने आप को वास्तविक इंसान नहीं मान सकता, उनकी वेतन बढ़ानी ही चाहिए तभी वह स्वयं को स्वाभिमानी और अमीर उन्हें इंसान समझेंगे,  बड़े-बड़े सेक्टर इनकी पेमेंट घटानी चाहिए और जो छोटे सेक्टर है उनकी पेमेंट बढ़ा देनी चाहिए   कर्म के प्रति इतना अनैतिक व्यवहार हम कैसे करसकते हैं देश में जो वास्तविक जीडीपी बनाता है उसे हम मूर्ख पागल समझते हैं और जो जीडीपी में ना के बराबर मेहनत करता है उससे हम मालिक भगवान और सर्वश्रेष्ठ मानते हैं जरूरत है इन दोनों ही लोगों में कर्म को प्रधानता देने की जो लोग वास्तविक रूप से कर्मठ है उन्हें उनका स्वाभिमान देने की अधिकार देने की क्योंकि से यह दुनिया...

भारत में गरीबी दूर कैसे हो सकती हैं।

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एक देश की अर्थव्यवस्था केवल पूंजी या लोगों के पास निवेश करने से चलती है लेकिन भारत का पैसा लगभग 50% पैसा मंदिरों में ,या मंदिरों से जुड़े लोगों के पास जमा है यदि देश विदेशों से लोन लेता है और अपने पास में रखे पैसे को निष्क्रिय करके रखता है तो उस देश की अर्थव्यवस्था कैसे सुधर सकती है जरूरत है सही माइनों की धर्म को अपनी जगह रखना चाहिए और देश के विकास को अपनी जगह, लेकिन भारत जैंसी अर्थव्यवस्था में धर्म , अर्थव्यवस्था को नष्ट करने में अपनी भूमिका दे रहा है इसमें सुधार होना आवश्यक है इस वीडियो में आप देख सकते हैं भारत जैसी अर्थव्यवस्था में पिछड़ेपन का कारण सभी जानते हैं सभी समझते  हैं लेकिन कोई भी इस लेपन से बाहर नहीं आना चाहता।       मनुष्य से धर्म है लेकिन धर्म से मनुष्य नहीं लेकिन मनुष्य ने अपने आपको बांध लिया हैं, गुलाम बना लिया है, लोगों को धर्म पर खर्च को बंद करना होगा तभी सुधार हो सकता हैं।  क्या आपको नहीं पता है कि धर्म के ऊपर कितना खर्च होता है इसके कितने सारे एजेंट हैं और अमीरी और गरीबी का फर्क किस कारण से हो रहा है यह सब भारत में धर्म या धार्मिक...

व्यक्ति के नीजि अधिकार क्या होना चाहिए

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इतिहास गवाह है जब-जब अर्थशास्त्र और नैतिकता के बीच संघर्ष हुआ है तब  जीत अर्थशास्त्र की हुई है क्योंकि नीहित स्वार्थो को स्वेच्छा से तब तक नहीं टाला जा सकता जब तक गरीब लोगों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ नहीं बनाया जायें।      उदासिनता खतरनाक बीमारी हैं जो लौगो  को पिछडेंपन और गरीबी की ओर ले जाती हैं।      भारत जैसी अर्थव्यवस्था में गरीबी और अमीरी के अंतर को मिटाने के लिए आवश्यक है कि एक ऐसे परिवार के व्यक्ति जो अच्छे पद या प्रतिष्ठित स्थिति में है तो उनसे उनकी अन्य पद या उनकी संपत्ति का अधिकार छीन लेना चाहिए क्योंकि अमीरी और गरीबी का फैसला इसी कारण से हो रहा है                         जिस प्रकार यदि सरकारी नौकरी में एक पद से व्यक्ति यदि दूसरी पद में जाता है तो वह उसके पहले वाले पद को छोड़ देता है या छोड़ना पड़ता है इसी प्रकार इससे समझ सकते हैं कि जमीन को एक निजी संपत्ति ना मानते हुए 1 पद माना जाए और इसी एक निश्चित आधार बनाकर उसे संपत्ति का अधिकार आदि प्रदान किया जाना चाहिए इसके लिए कुछ...

भारतमें पूंजीकरण एक अभिशाप हैं।

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 अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद की ओर बढ़ने वाली प्रकृति निंदनीय हैं इतिहास जानता है कि पूंजीवादी व्यवस्था में कार्य संचालन में केवल प्राइवेट कंपनी एवं ऐसी संस्थाओं द्वारा होता है जिसमें जिसमें मालिक होता है और मालिक का पद पीढ़ी दर पीढ़ी वाला होता है अर्थात मालिक का लड़का या उसका रिश्तेदार ही केवल उस कंपनी का मालिक बन सकता है,चाहे वह योग्यता हो या अयोग्य हो।   यह वैशी व्यवस्था हैं  जैसे प्राचीन काल में राजा का लड़का ही राजा बन सकता था इस तरह पूंजीवादी लोग स्वयं अपने पुत्र या परिवार को ही उत्तराधिकारी बनाते हैं भले ही वह योग हो या अयोग्य। इसलिए भारत इतिहास से इस व्यवस्था का विरोधी रहा है  क्योंकि यह अनैसर्गिक हैं जिसमें गरीब,  गरीब ही रह जाएगा और अपने जीवन में कभी सुधार नहीं कर सकता ऐसी व्यवस्था जो एक गरीब को गरीब  बनाए रखना चाहती है उसकी योग्यता को नष्ट करती हैं यह एक  मानवता का विनाश है, इसके सहारे मानव जाति का विनाश होना निश्चित हैं, भारत को अपने गौरव को बचाना हैं, तो इसका विरोध करना होगा।

प्रकृति ने इंसान को क्यों बनाया

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 प्रकृति ने दुनिया में एक चीज बनाई थी वह है इंसान जो कि दूसरों के दुखों को समझ सकता है और उन समस्याओं का समाधान भी कर सकता है । लेकिन इंसान अपने ही इस विशेष गुण भूल चुका है यदि इस दुनिया में इंसान ही अपने इस काम को भूल जाएगा और अन्य प्राणी की तरह व्यवहार करेगा तो यह दुनिया कैसे चलेगी।  आज आवश्यकता है कि इस धन के पीछे भागने वाली इस व्यवस्था को बदलने की, क्योंकि धन पर ब्याज के नाम पर या अन्य किसी भी नाम पर मालिकाना हक के नाम पर लोग अमीर बनकर के दूसरो को गरीब बनाकर उन्हे प्रताड़ित करते हैं । धन के नाम पर यह बहुत बड़ा वर्ग संघर्ष हो चुका है और यह बहुत ही विनाशक है अनैसर्गिक है । इसलिए दुनिया के सभी लौगो को मिलकर नई सोच विकसित करें नए अवसर खोजे जिससे कि वह स्वयं और इस दुनिया के अन्य प्राणी को भी बचा सकें। धन्यवाद