देश में आज समय की मांग
भारत देश में आज समय की मांग
सच में आज भारत ऐसे दौर से गुजर रहा है जब लोगों ने अपने आप को संविधान से ऊपर रख लिया है और यही कारण है कि आज भारत दुनिया का एक ऐसा देश बन चुका है जहां असमानता चरम सीमा पर है आखिर भारत देश ऐसी स्थिति में कैसे पहुंच गया कारण सभी को मालूम है लेकिन सुधार कोई नहीं करना चाहता सुधार में क्या करना है यह भी सभी को मालूम है।
भारतीय संविधान के निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय कहा था क्या इतिहास अपने आप को दोहराएगा यह विचार मुझे चिंता से भर देता है इस तथ्य के एहसास से यह चिंता और गहरी हो जाती है कि जाति और धर्म के ऊपर हमारे शत्रुओं के अलावा हमारे देश में अलग-अलग विरोधी धाराओं वाले राजनीतिक दल भी होंगे क्या भारत देश के लोग भारत देश को अपने पंथो से ऊपर रखेंगे क्या वह अपने पंथो को देश से ऊपर रखेंगे मैं नहीं जानता
किंतु इतना तो निश्चित है कि हमारी आजादी दूसरी बार खतरे में पड़ जाएगी और शायद हमेशा के लिए खो जाएगी
और वास्तव में आज हम ऐसे दौर पर पहुंच चुके हैं जब लोगों ने संविधान को मजाक बनाकर रख दिया है कोई भी व्यक्ति या संस्था संविधान के बनाए नियमों का 5% भी अनुसरण नहीं करती है प्रत्येक काम में वह जनता के मूल्य उनकी जरूरतों के साथ सौदा करने में लगे हुए हैं और केवल और केवल अपने स्वार्थ के लिए गरीबों को लूटना चाहते हैं किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता ।
और समस्त गरीब वर्ग जो कहीं ना कहीं अपने आप को ठगा महसूस करते हैं वह इससे स्वयं समझौता कर बैठा है उसे मिलने वाले अधिकार को वह भीख समझ कर के प्राप्त करता है यदि उसने कहीं रिश्वत ना दी तो उससे वह भीख न छिन जाए क्या वास्तव में जो लोग गरीबों को लूटते हैं वही दोषी हैं उससे कहीं ज्यादा दोषी वह व्यक्ति है जो अपने अधिकारों को भीख समझ कर सरकारी तंत्र से लेते हैं।
आखिर हम कब तक संविधान द्वारा बनाए गए तंत्र को नहीं मानेंगे जब तक हम संविधान को नहीं मानेंगे भ्रष्टाचार की खाई इतनी गहरी हो जाएगी कि शायद हम उसे कभी भी पाट नहीं पाएंगे आज आवश्यकता है हर व्यक्ति को उस संविधान को मानने की उसका अनुसरण करने की अपने अधिकारों को जानने के साथ-साथ उसे पाने की भी
हमें आज भी अपने आप को अपने धर्म, मूल्य, और स्वार्थ से ऊपर संविधान को रखना होगा नहीं तो यह देश वास्तविक रुप से दूसरी बार गुलाम हो जाएगा।
हमें संविधान को अपनी धार्मिक विचार धाराओं से, किसी पार्टी की विचारधाराओ से, किसी संस्था की विचारधाराओं से, और अपनी स्वयं की परंपरावादी मान्यताओं से ऊपर रखना होगा नहीं तो निश्चित है कि हमारी आजादी दूसरी बार खतरे में पड़ जाएगी और शायद हमेशा के लिए खो जाएगी।
.jpeg)
.jpeg)

Comments