सरकारी कर्मचारी स्वयं के पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हैं...

सरकारी कर्मचारी स्वयं के पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हैं...

हमारा देश आज जिस भ्रष्टाचार की स्थिति में है हर छोटे से छोटा गरीब व्यक्ति हो या बड़े से बड़ा अमीर व्यक्ति हो उसे अपने काम के बदले जो पैसे मिलते हैं उससे कभी खुशी नहीं मिलती उसकी तनख्वाह जो भी हो उसे प्राप्त करने के बाद उसे कोई खुशी नहीं मिलती लेकिन गलत तरीके से अगर उसने कुछ भी पैसे कमा लिया तो उसकी खुशी अपने आप में कई गुनी हो जाती है यह समाज किस मनोवृत्ति पर पहुंच चुका है यह बताने की आवश्यकता नहीं है खासकर सरकारी विभाग में देखें तो अधिकारी कर्मचारी उन्हें उनकी आवश्यकताओं व योग्यताओं के आधार पर उचित वेतन मिलता है लेकिन वह फिर भी खुश तभी दिखाई देते हैं जब उन्होंने कहीं से रिश्वत पाई हो या किसी ने उन्हे नासमझी के कारण उन्हें कुछ अधिक पैसे दे दिये हो। 

समाज को बर्बाद करने में भ्रष्ट करने में सबसे बड़ा हाथ सरकारी कर्मचारियों का ही है और इन्होने ही लौगो की ऐसी मनोवृत्ति बना दी हैं हमेशा राजनीतिक दबाव के कारण यह भ्रष्ट नहीं होते हैं भ्रष्ट यह अपने स्वयं के स्वभाव के कारण हो रहे हैं अपने स्वभाव में इन्होंने मान लिया है कि बिना रिश्वत लिए कोई खुशी नहीं मिलती, गरीबों का हक छिनकर खाएं बिना जीवन जीने का कोई मतलब इन्हे समझ नहीं आता हैं । इनकी गिरी मानसिकता की खास बात तो यह है कि जब यह अपने करीबी या दोस्तों से बात कर रहे हो तो इनके बात का टॉपिक यह होता है कि मैंने आज उससे इतने रुपए ज्यादा ले लिए मैंने उस व्यक्ति को उल्लू बना दिया और इन्हें  आनंद की अनुभूति इसी से होती है इन बातों के सिवाय इन्हें दूसरों से बात करने पर कोई मजा नहीं आता और कोई दूसरा टॉपिक इसके सिवाय इनके लिए मजेदार नहीं होता और सबसे बड़ी बात इनके लिए यह है कि ऐसे काम करने से इनको लगता है कि इससे इनकी इज्जत बढ़ती है और समाज में प्रतिष्ठा बढ़ती है समाज को खोखला करने वाले मुख्य रूप से जिम्मेदार यही लोग हैं जो केवल अपनी गलत मानसिकता के कारण समाज को बर्बाद कर रहे हैं।
         एक जमाना था जब कुछ डाकू और चोर लौंग ईमानदार काम करने वाले लोगों से हफ्ता वसूली करते थे या उनकी कमाई से कुछ हिस्सा मांगा करते थे या लौगो के घर से चौरी करते थे लेकिन आज स्वरूप बदल चुका है आज यह सरकारी कर्मचारी अपने ही निचले स्तर के कर्मचारियों से या सीधे गरीब लोगों से परसेंटेज,कमीशन या हिस्सा जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके रुपए वसूलते हैं।   
       आज निजीकरण तेजी से हो रहा है और सरकारी सिस्टम नष्ट होने वाला है इसे नष्ट करने वाले कोई और नहीं यही सरकारी कर्मचारी है इसका खामियाजा भी इन्हीं सरकारी कर्मचारियों को भुगतना पड़ेगा क्योंकि इन्होंने हमारे महापुरुषों के द्वारा किए गए बड़े-बड़े कार्यों को गर्त में डाल दिया है उनके सपनों को तहस-नहस करके बर्बाद कर डाला है।

निजीकरण आज सबसे बड़ी चुनौती है सभी को पता है की परिवारवाद ही निजी करण की प्रमुख विशेषता रही है गरीबों  का जिसमें सबसे निचले पायदान पर स्थान होता है उनसे पढ़ने लिखने की तो छोड़ो सोचने तक की आजादी छीन ली जाती है। जो लौंग निजीकरण का विरोध कर रहे हैैं पहले उन्हें अपनी आर्थिक मानसिकता को बदलने की आवश्यकता हैं तभी हमारे महापुरुषों का सपना पुरा होगा और देश समानता के साथ विकास कर सकेगा।



Comments

Popular posts from this blog

देश में आज समय की मांग

आरक्षण कैसे समाप्त हो सकता है

आर्थिक आधार पर आरक्षण कैसे हो - राममनोहर लोहिआ